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दासोsहं कोसलेन्द्रस्य रामस्याक्लिष्टकर्मणः। हनूमान् शत्रुसैन्यानां निहन्ता मारुतात्मजः।।

    
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दिनांक 13.12.2013 को महावीर मन्दिर परिसर में अपराह्ण 4ः00 बजे से विगत वर्षों की भाँति गीता-जयन्ती का समारोह आचार्य श्रीरंजन सूरिदेव की अध्यक्षता में आयोजित किया गया। इसका संचालन मन्दिर के प्रकाशन प्रभारी प. भवनाथ झा ने किया।

इस कार्यक्रम में पं मार्कण्डेय शारदेय, डा. भूलन सिंह, श्री पंकज पाण्डेय आदि वक्ताओं ने गीता पर अपने विचार रखे।

पं. भवनाथ झा ने कहा कि ईशा की पहली शती में भी लोग गीता का प्रवचन सुना करते थे। संस्कृत में सबसे अधिक व्याख्या इसी ग्रन्थ की हुई है।

इस अवसर पर एस. एस. आर्थो हास्पीटल के संस्थापक डा. मिथिलेश कुमार जी द्वारा लिखित पुस्तक ‘‘गीता-सुबोधिनी’’ का विमोचन आचार्य किशोर कुणाल ने किया।

डा. मिथिलेश कुमार ने इस पुस्तक में संस्कृत के श्लोकों की व्याख्या सरल भाषा में की है। यह पुस्तक पूर्व में डा. श्रीरंजन सूरिदेव के संपादकत्व में धारावाहिक रूप से पत्रिका में प्रकाशित हो चुका है।

आचार्य श्रीरंजन सूरिदेव ने कहा कि गीता प्रत्येक मनुष्य का मार्ग दर्शन करनेवाली देववाणी है। इसमें सामाजिक समरसता का सिद्धान्त यह है कि यहाँ कर्म के आधार पर जाति का निर्धारण किया गया है, न कि जन्म के आधार पर। यह प्रत्येक मानव के लिए पठनीय ग्रन्थ है।

गीता के महत्त्व पर बोलते हुए मन्दिर के परमाचार्य श्री उद्धव दासजी ने कहा कि सनातन धर्म में तीन विधाएं हैं, ज्ञान, कर्म, उपासना या भक्ति।

इस दृष्टि से भगवान् यशोदानन्दन ने 18 अध्यायों में गीता का वर्णन किया है। सारे धर्मों का मूल वेद है; वेदो का सार भाग उपनिषद् हैं और उन उपनिषदों का सार भाग गीता है।

श्री पंकज पाण्डेय, आचार्य किशोर कुणाल, आचार्य श्रीरंजन सूरिदेव, पं. भवनाथ झा पुस्तक विमोचन करते हुए
गीता-जयन्ती, 2013