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दासोsहं कोसलेन्द्रस्य रामस्याक्लिष्टकर्मणः। हनूमान् शत्रुसैन्यानां निहन्ता मारुतात्मजः।।

    
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रामावत-संगत
महावीर मन्दिर न्यास ने हाल में ‘‘रामावत संगत’’ की स्थापना का ऐतिहासिक निर्णय लिया है। इसका शुभारम्भ आगामी कार्तिक महीने में महावीर मन्दिर के द्वारा आयोजित भव्य सीता-राम महायज्ञ से होगा। संगत की स्थापना की आवश्यकता इसलिए पड़ी है कि महावीर मन्दिर के जो लाखों भक्त हैं उनके और महावीर मन्दिर के बीच कोई सम्पर्क नहीं रहा है। अतः भक्तों के अनुरोध पर इस सम्प्रदाय की स्थापना की जा रही है, जिसमें यद्यपि सभी देवताओं की पूजा होगी, किन्तु सर्वप्रधान देवता सीताजी, रामजी एवं हनुमानजी होंगे।
इसमें वेद, उपनिषद्, भागवत एवं सभी मुख्य धर्मशास्त्रों का यथोचित महत्त्व दिया जाएगा, किन्तु रामायण (वाल्मीकि, अध्यात्म एवं मानस) एवं गीता को सर्वोपरि ग्रन्थ के रूप में माना जायेगा।

यह संगत सामान्यतः जगद्गुरु रामानन्दाचार्य के सिद्धान्तों के अनुरूप होगा। उनके सिद्धान्तों को मानने वाले साधुओं के लिए वैरागी सम्प्रदाय है, किन्तु गृहस्थों के लिए यह रामावत पन्थ होगा, जिसका मूल मन्त्र रामानन्दाचार्य का उद्घोष वाक्य- जात पात पूछै नहि कोई हरि कौ भजै सो हरि को होई

इसके अलावे रामानन्दाचार्य-विरचित ग्रन्थ ‘वैष्णव-मताब्ज-भास्कर’ में जिन मौलिक सिद्धान्तों का प्रतिपादन हुआ है उनका अनुसरण होगा। रामावत-पन्थ में अहिंसा (शाकाहार), हर प्रकार के व्यसन को तिलांजलि एवं नैतिक मूल्यों पर विशेष बल दिया जायेगा तथा इसके अनुयायी आर्थिक एवं चारित्रिक शुचिता का पूर्ण ध्यान रखेंगे। परोपकार इस पन्थ में धर्म का मूल स्तम्भ होगा। प्रत्येक भक्त को प्रतिदिन एक नेक काम करने के लिए प्रेरित किया जायेगा।

रामावत संगत सभी साधुओं एवं सन्तों का पूर्ण सम्मान करते हुए नकली एवं ढोंगी साधुओं से जनता को सावधान करेगा। इस पन्थ में दीक्षा की अनूठी प्रथा होगी। जो भक्त दीक्षित होना चाहेंगे, उन्हें महावीर मन्दिर में हनुमानजी के सामने संकल्प के बाद कुछ गोपनीय मन्त्रों को सीलबन्द करके मन्दिर में रख दिया जायेगा। अगली आरती के बाद हनुमानजी के सामने सीलबन्द मन्त्रों में से कोई एक चुनने को कहा जायेगा। भक्त द्वारा जो मन्त्र निकलेगा वही उसके लिए गुरु-मन्त्र रहेगा। इस मन्त्र का वाचन एवं व्याख्या मन्दिर के आचार्य द्वारा कर दिया जायेगा। मन्त्र की प्राप्ति हनुमानजी की प्रेरणा से होगी।

रामावत संगत संगत एवं पंगत के सिद्धान्त का प्रचार-प्रसार करेगा। इसके अनुसार सभी भक्तों को गाँव या शहर के किसी मन्दिर में सप्ताह माह में एक दिन साथ बैठकर पूजा-पाठ करना पड़ेगा जिसमें अमीरी-गरीबी या जात-पाँत का भेदभाव नहीं होगा। इसी प्रकार, वर्ष में कम-से-कम एक बार किसी पर्व रामनवमी, जन्माष्टमी, शिवरात्रि, हनुमान-जयन्ती, दुर्गापूजा आदि के अवसर पर एक साथ बैठकर बिना भेदभाव के भोजन करना होगा।
यह पन्थ सामाजिक सद्भाव एवं साम्प्रदायिक सौहार्द पर पूरा बल देगा; किन्तु राष्ट्रभक्ति इस सम्प्रदाय की अटूट शक्ति होगी।
चूँकि यह पन्थ हनुमानजी को शिवजी का अवतार मानता है और गोस्वामी तुलसीदासजी की शैली में शिव एवं विष्णु की पूजा-अर्चना को अन्योन्याश्रित (एक दूसरे पर आश्रित) मानता है; अतः तुलसी-माला के साथ या विकल्प के रूप में रुद्राक्ष धारण करने की भी स्वतन्त्रता रहेगी।

‘प्रपत्तिवाद’ (यानी प्रभु की शरणागति) इसका मूल दर्शन माना जाएगा। इस दर्शन का आधार वाल्मीकि रामायण में राम की वह वाणी होगी जो उन्होंने विभीषण के प्रति कही थी-

सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम।।

यानी मेरी शरण में कोई भी व्यक्ति एक बार आकर यह कहता है कि मैं आपकी शरण में हूँ, तो मैं उसे सभी प्राणियों से अभय प्रदान करता हूँ, यह मेरा व्रत है।

प्रारम्भ में, महावीर मन्दिर, पटना, विराट् रामायण मन्दिर, जानकी नगर (केसरिया के पास) एवं अयोध्या तीन इसके मुख्यालय होंगे। बाद में, अन्य तीर्थों में भी इसकी स्थापना की जायेगी।

इस रामावत संगत का तत्काल लक्ष्य होगा- महावीर मन्दिर के तत्त्वावधान में निर्माणाधीन ‘विराट् रामायण मन्दिर’ का निर्माण सम्पन्न करना। यह मन्दिर विश्व का विशालतम मन्दिर होगा, जो केसरिया के पास बन रहा है। इसमें 300 करोड़ रुपये का व्यय होगा, जिस राशि का प्रबन्ध भक्तों के सहयोग से होगा। इसके बारे में समय-समय पर जानकारी दी जायेगी।