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दासोsहं कोसलेन्द्रस्य रामस्याक्लिष्टकर्मणः। हनूमान् शत्रुसैन्यानां निहन्ता मारुतात्मजः।।

    
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श्रीकृष्ण-जन्माष्टमी व्रत, दि. 09 अगस्त, 2012 ,     

कार्यक्रम की रूपरेखा
गी ता के उपदेशक भगवान् श्रीकृष्ण भजन-कीर्तन 09 रात्रि से 10-30 रात्रि तक
भागवत एवं गीता से स्तुति-पाठ 10-30 रात्रि से 12-00 रात्रि तक
आरती 12-00 रात्रि से 12-30 रात्रि तक
प्रसाद-वितरण 12-30 रात्रि से

 

धर्मशास्त्रीय निर्णय


बहुत-से भक्तों ने जिज्ञासा की है कि जन्माष्टमी व्रत कब है। शास्त्रों का विवेचन एवं महावीर मन्दिर के दो विद्वानों पं. भवनाथ झा एवं प. जटेश झा के द्वारा दिये गये निर्णय के आलोक में जन्माष्टमी व्रत दिनांक ०९.०८.२०१२ गुरुवार को है क्योंकि इसी दिन रात्रि में अष्टमी तिथि है। दिनांक १०.०८.२०१२ को रात्रि में अष्टमी तिथि नहीं है, जिस समय भगवान्‌ कृष्ण का जन्म हुआ था।

अष्टमी दिनांक 9 अगस्त को 10 ः50 बजे दिन से अगले दिन 12 ः 44 दिन तक है। इस वर्ष रोहिणी नक्षत्र दो दिन बाद दिनांक 11 अगस्त को 9 ः 54 बजे से प्रारम्भ होकर 12 अगस्त को 12 ः19 दोपहर तक है। इस प्रकार इस वर्ष तिथि एवं नक्षत्र का संयोग नहीं है अतः जयन्तीव्रत का योग नहीं बन रहा है। अतः कृष्णजन्म के उपलक्ष्य में मनाया जानेवाला व्रत एवं कार्यक्रम दिनांक ०९.०८.२०१२ को होगा जिस दिन अर्द्धरात्रि में अर्थात्‌ ठीक बजे अष्टमी हो उस दिन व्रत, उपवास और कृष्ण-जन्मोत्सव का विधान किया गया है।

ऐसी स्थिति में उपवास या व्रत के सम्बन्ध में धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों के आधर पर निर्णय देते हुए भारत-रत्न महामहोपाध्याय पाण्डुरंग वामन काणे ने लिखा है-

''यदि जयन्ती (रोहिणीयुक्त अष्टमी) एक दिन वाली है, तो उसी दिन उपवास करना चाहिए, यदि जयन्ती न हो तो उपवास रोहिणी युक्त अष्टमी को होना चाहिए, यदि रोहिणी से युक्त दो दिन हों तो उपवास दूसरे दिन किया जाता है, यदि रोहिणी नक्षत्र न हो तो उपवास अर्धरात्रि में अवस्थित अष्टमी को होना चाहिए या यदि अष्टमी अर्द्धरात्रि में दो दिनों वाली हो या यदि अर्द्धरात्रि में न हो तो उपवास दूसरे दिन किया जाना चाहिए। (धर्मशास्त्र का इतिहास, चतुर्थ भाग, पृष्ठ संख्या- ५५)

महामहोपाध्याय पाण्डुरंग वामन काणे के उपर्युक्त उद्धरण के आलोक में भी यह व्रत दिनांक ०९ अगस्त, २०१२ को मनाया जायेगा क्योंकि उसी रात्रि में अष्टमी तिथि को भगवान्‌ श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था।

1938 ई. में मिथिला के मूर्द्धन्य विद्वानों की समिति के विचार-विमर्श के बाद द्वारा संपादित ग्रन्थ पर्व-निर्णय में भी कृष्णाष्टमी व्रत के व्यवस्थापक पं. दयानन्द ठाकुर ने लिखा हैः-

अथ व्रतकाल व्यवस्था

अत्र भाद्रकृष्णाष्टमी द्विविधा- रोहिणीरहिता, तत्सहिता च। तत्राद्या चतुर्विधा- (1) पूर्वदिन एव निशीथमभिव्याप्नोतीत्येका, (2) परदिन एव निशीथमभिव्याप्नोति इति द्वितीया। (3) उभयदिनाधिकरणा निशीथव्यापिकेति तृतीया, उभयदिनाधिकरणिकापि निशीथं न व्याप्नोतीति चतुर्थी। तासु पूर्वदिन एव निशीथव्यापिनी पर दिन एव वा निशीथव्यापिनी, तयोर्यत्र निशीथव्यापिनी तद्दिन एव व्रतम्, निशीथस्य कृष्णजन्माधिकरणीभूतकालत्वेन-

कर्मणो यस्य यः कालस्तत्कालव्यापिनी तिथिः। (पृ. 48)

अर्थात् भाद्रकृष्ण अष्टमी दो प्रकार की होती है- रोहिणी नक्षत्र से रहित एवं रोहिणी नक्षत्र सहित। पहली स्थिति चार प्रकार की होती है- (1)पूर्व दिन में ही रात्रि में अष्टमी रहे, (2) अगले दिन ही रात्रि में अष्टमी रहे, (3) दोनों दिन रात्रि में अष्टमी तिथि रहे,(4) दोनों दिन में से किसी भी दिन रात्रि में अष्टमी न रहे। इन स्थितियों में केवल पूर्व दिन रात्रि में अष्टमी हो या केवल पर दिन ही रात्रि में अष्टमी हो तो जिस दिन रात्रि में अष्टमी रहे उस दिन ही व्रत करना चाहिए, क्योंकि निशीथ यानी आधी रात को कृष्णजन्म का काल माना गया है और कहा गया है कि कर्म का जो काल हो, उस काल में जो तिथि रहती है वहीं मान्य है।

इसी ग्रन्थ में पं. श्री नमोनारायण झा ने भी कहा है कि

रोहिण्यलाभे तु निशीथगामिन्यामष्टम्यां व्रतम्

दिवा वा यदि वा रात्रौ नास्ति चेद् रोहिणी कला।

रात्रियुक्तां प्रकुर्वीत विशेषेणेन्दुसंयुताम्। इति माधवाचार्यधृतवचनात्,

उपोष्य जन्मचिह्नानि कुर्याज्जागरणं तु यः।

अर्द्धरात्रयुताष्टम्यां सोश्वमेधफलं लभेत्। इति नारदीयाच्च

अर्थात् यदि रोहिणी का योग न रहे तो ऩिशीथ में जिस दिन अष्टमी रहे उस दिन व्रत होना चाहिए। क्योंकि माधवाचार्य के कालमाधव में कहा गया है कि दिन या रात में यदि रोहिणी एक कला के लिए भी न हो तो विशेष रूप से चन्द्रमा से संयुक्त अर्थात् अष्टमी के चन्द्र से युक्त रात्रि वाले दिन में व्रत करना चाहिए। नारद पुराण में भी कहा गया है कि अर्द्धरात्रि से युक्त अष्टमी में जन्म के लक्षण से युक्त समय में व्रत करके जो जगरण करते हैं वे अश्वमेध का फल प्राप्त करते हैं।

इस प्रकार दिनांक ९.०८.२०१२ की रात्रि में महावीर मन्दिर में जन्मकालीन पूजा-पाठ सम्पन्न होगा। इस अवसर पर महावीर मन्दिर के प्रथम तल पर कृष्ण भगवान्‌ के गर्भ-गृह के समक्ष रात्रि बजे से भजन-कीर्तन एवं पूजा-पाठ होगा, भागवत-पुराण से कृष्ण-जन्म के प्रसंग का पाठ तथा गीता का पाठ होगा। यह कार्यक्रम रात्रि तक चलेगा। इस कार्यक्रम में सभी श्रद्धालु आमन्त्रित हैं।
कृष्णाष्टमी की एक अन्य परम्परा के अनुसार कुछ लोग जन्म के अगले दिन जन्मोत्सव मनाते हैं तथा उस दिन व्रत रखते हुए भगवान्‌ कृष्ण की मूर्ति का दर्शन करते हैं। अतः जो लोग जन्म के अगले दिन का व्रत रखते हैं, वे दिनांक १० अगस्त, २०१२ को व्रत रखेंगे। दूसरी परम्परा के अनुसार साधुगण एवं कुछ स्थान के लोग रोहिणी में व्रत रखते हैं, वे दिनांक ११ एवं १२ को भी व्रत रखेंगे, किन्तु महावीर मन्दिर में दिनांक ०९ अगस्त, २०१२ को जन्माष्टमी मनायी जायेग।