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दासोsहं कोसलेन्द्रस्य रामस्याक्लिष्टकर्मणः। हनूमान् शत्रुसैन्यानां निहन्ता मारुतात्मजः।।

    
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Tulasi Jayanti

न्यायमूर्ति डा. राजेन्द्र प्रसाद की अध्यक्षता में आयोजित कार्यक्रम का संचालन करते हुए महावीर मन्दिर प्रकाशन के प्रभारी भवनाथ झा ने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास की कृतियों की पाण्डुलिपियाँ देश के विभिन्न भागों में पायी जाती हैं। इन पाण्डुलिपियों के आधार पर तुलसी साहित्य का पाठालोचन आज बहुत आवश्यक हो गया है। जिस प्रकार वाल्मीकि रामायण महाभारत आदि आर्ष ग्रन्थों के आलोचनात्मक संस्करण संपादित किये गये हैं जिससे यह सुनिश्चित हो जाता कि किस पाण्डुलिपि में क्या पाठ है वैसा ही संस्करण तुलसी साहित्य का भी निकलना चाहिए। उन्होंने भरतपुरा से प्राप्त पाण्डुलिपि की चर्चा करते हुए कहा कि उसमें अनेक स्थलों पर अधिक पाठ भी उपलब्ध है जिनका विवेचन शोध के लिए आवश्यक है।


आचार्य किशोर कुणाल ने तुलसी कृत कवितावली के आधार पर महर्षि वाल्मीकि के आश्रम का स्थान निर्धारित करते हुए कहा कि बनारस और इलाहाबाद के बीच में सीतामढ़ी के नाम से प्रसिद्ध एक स्थान है जो दिगपुर और बारीपुर के बीच में है। तुलसीदासजी ने लिखा है कि यहीं पर महर्षि बाल्मीकि का आश्रम था यहीं लव-कुश का जन्म हुआ था और जानकी जी का वनवास का स्थल भी यहीं था। बाल्मीकि रामायण के अनुसार बाल्मीकि का आश्रम गंगा के दक्षिण सिद्ध होता है जबकि इसके विपरीत तुलसीदासजी ने गंगा के उत्तरी तट पर यह स्थान माना है। इससे इस स्थान के प्रति गोस्वामीजी की विशेष आदर भावना सिद्ध होती है। आचार्य किशोर कुणाल ने विद्वानों के समक्ष यह प्रश्न रखा कि कहीं इसी क्षेत्र में तुलसीदासजी का जन्म स्थान तो नहीं था।


अपने अध्यक्षीय भाषण में न्यायमूर्ति राजेन्द्र प्रसाद ने कहा कि तुलसीदास की रचनाओं के ऊपर प्राध्यापकीय शोध करने से भी यह महत्त्वपूर्ण है कि हम उनके द्वारा दी गयी नैतिक शिक्षा को हम अपने जीवन में उतारे उसपर अमल करें। गोस्वामीजी के प्रति यह सबसे बडी श्रद्धांजलि होगी।


इस कार्यक्रम में डा. जियालाल आर्य प्रो. रामविलास चौधरी एवं मिथिलेश कुमारी मिश्रा ने तुलसीदास के प्रति श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए उनकी रचनाओं पर प्रकाश डाला और उसकी प्रासंगिकता सिद्ध किया। इस कार्यक्रम में पं. गजेन्द्र महाराज समीर कुमार शर्मा एवं गुंजन आदि भी उपस्थित हुए।

GOSWAMI TULASIDAS

आज दिनांक २५.०७.२०१२ को महावीर मन्दिर के तत्त्वावधान में गोस्वामी तुलसीदासजी की जयन्ती सन्ध्या ४ बजे से मनायी गयी। परम्परानुसार श्रावण शुक्ल सप्तमी के दिन रामचरितमानस के अमर रचयिता तुलसीदास की जयन्ती मनायी जाती है। इस कार्यक्रम का आरम्भ मन्दिर परिसर में स्थापित गोस्वामीजी की प्रतिमा पर माल्यार्पण तथा पं. गजेन्द्र महाराज द्वारा प्रस्तुत मंगलाचरण से हुआ।

     तुलसी- जयन्ती २०१२, दिनांक- २५.०७.२०१२