Latest Articles
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Dr. Lakshmikant Vimal
महावीर मन्दिर की पत्रिका धर्मायण में डा. विमल के अनेक शोधालेखों का प्रकाशन किया गया है। इन लेखों में उन्होंने मिथिला की विशिष्ट परम्परा ... -
सूर्य सिद्धान्त का काल तथा शुद्धता (भाग-2)- श्री अरुण कुमार उपाध्याय
भारतीय काल-गणना का स्पष्ट प्रतिपादन होने के बाद भी यूरोपियन विद्वानों ने इसे एक शिरे से नकार दिया और सारी गणना जूलियन तथा ग्रेगोरियन ... -
सांस्कृतिक समन्वय के युगप्रतीक : श्रीराम – श्री महेश प्रसाद पाठक
मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम की कथा वाल्मीकि-रामायण सुदूर उत्तर से लेकर सुदूर दक्षिण पढा और क्षेत्रीय लिपियों में लिपिबद्ध किया गया है। यह इस बात का ... -
मैथिल महाकवि रूपनाथ उपाध्याय प्रणीत श्रीरामविजय महाकाव्य – डॉ. लक्ष्मीकान्त विमल
रामकथा तो वह भागीरथी है, जिसमें स्नान कर सभी लोग पवित्र होना चाहते हैं। इसी क्रम में मिथिला के महाकवि रूपनाथ उपाध्याय कृत श्रीरामविजय ... -
रामायण के प्रसिद्ध पात्र श्रवण कुमार के वास्तविक नाम की खोज : “यज्ञदत्तवध” – डॉ. काशीनाथ मिश्र
महान् मातृ-पितृभक्त श्रवण कुमार वाल्मीकि-रामायण के चर्चित पात्र हैं, लेकिन यह प्रश्न उठता रहा है कि श्रवण उनके पिता का नाम था ... -
श्रीरामनामलेखन की विधि- श्री अंकुर पंकजकुमार जोषी
कलियुग में रामनाम-लेखन एक विशिष्ट यज्ञ माना गया है। इसके लिए अनेक प्रकार की पुस्तिकाएँ प्रकाशित की गयी हैं। महावीर मन्दिर के परिसर ... -
पुरातात्त्विक स्रोतों में राम और शिव की उपासना का समन्वय -डॉ. सुशान्त कुमार
उपासना के क्षेत्र में हम सर्वधर्मसमन्वयवाद के पुजारी रहे हैं। वैष्णव, शैव, शाक्त, गाणपत्य, सौर, आग्नेय ये सभी शाखाएँ हमें एक-दूसरी मान्यताओं का आदर ... -
वैष्णव चिह्नों की परम्परा और सन्त पीपाजी -डॉ. श्रीकृष्ण ‘जुगनूʼ
वैष्णवों की परम्परा में छह चिह्नों को शरीर पर धारण करना आवश्यक माना गया है- सुदर्शन चक्र, पाञ्चजन्य, धनुष, गदा, खड्ग, शंख-चक्र एवं पद्म। ... -
रामायण की रचना के साथ जुड़े रामकथा के पूर्व-संकेत -प्रोफे. डॉ. वसन्तकुमार म. भट्ट
रामकथा की ऐतिहासिकता पर अनेक विदेशी विद्वानों ने प्रश्नचिह्न उठाकर हमारी भारतीय परम्परा को अर्वाचीन सिद्ध करने का प्रयत्न किया है। इनमें सबसे मुखर ... -
श्रीरामपट्टाभिषेकविधि, (प्रथम बार पाण्डुलिपि से सम्पादित) -डॉ. ममता मिश्र दाश
दक्षिण भारत के आळवार सन्तों की परम्परा में भी ससीत-राम-लक्ष्मण की पूजा-परम्परा मुखर रही है। कर्मकाण्ड के सन्दर्भ में वहाँ एक विशेष प्रकार के ...




















महावीर मन्दिर प्रकाशन
महावीर मन्दिर प्रकाशन
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धर्मायण, अंक संख्या 114, परमहंस विष्णुपुरी विशेषांक