शिवताण्डवस्तोत्रम्

यहाँ भगवान् शंकर की विशिष्ट स्तुति शिवताण्डवस्तोत्र का पाठ पदच्छेद के साथ दिया जा रहा है। पदच्छेद को एकबार पढ लेने पर पाठकों को मूल शुद्ध-शुद्ध पढने में आसानी होगी। यद्यपि पदच्छेद को पाठ की दृष्टि से पढना नहीं चाहिए। क्योंकि श्लोक में संधि अनिवार्य होता है। हम सन्धि को तोड़कर यदि श्लोक का पाठ करते हैं तो उसे अशुद्ध वाचन कहा जाएगा। अतः केवल समझकर मूल पाठ को शुद्ध-शुद्ध पढ़ने की क्षमता विकसित करने हेतु यहाँ पदच्छेद दिया जा रहा है।

जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले 
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्।।1।। 
पदच्छेद
जटाटवी-गलज्-जल-प्रवाह-पावित-स्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्ग-तुङ्ग-मालिकाम्।
डमड-डमड-डमड्-डमन्-निनाद-वड्-डमर्वयं
चकार चण्ड-ताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्।।1।।

जटारूपी जंगल से बहते हुए जल की धारा (गंगानदी) से पवित्र गरदन में सर्प की विशाल माला धारण कर जिन्होंने डम-डम ध्वनि से डमरू बजाते हुए भयंकर ताण्डवनृत्य किया था, वे शिव हमारे कल्याण का विस्तार करें।

जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी 
विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्द्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम।।2।। 
पदच्छेद
जटा-कटाह-सम्भ्रम-भ्रमन-निलिम्प-निर्झरी
विलोल-वीचि-वल्लरी-विराजमान-मूर्द्धनि। 
धगद्-धगद्-धगज-ज्वलल-ललाट-पट्ट-पावके
किशोर-चन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ।।2।। 

जटारूपी कड़ाह में वेग से घूमती हुई नदी (गंगा) की चंचल लहरों को जिन्होंने अपने मस्तक पर लता के समान धारण किया है तथा जिनका ललाट की अग्नि धू-धू करती हुए जल रही है; मस्तक पर बालचन्द्र (द्वितीया का चन्द्रमा) विराजमान हैं, ऐसे शिव के प्रति मेरा सदा अनुराग रहे।

धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर 
स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्
दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि।।3।। 
पदच्छेद
धराधरेन्द्र-नन्दिनी-विलास-बन्धु-बन्धुर
स्फुरद-दिगन्त-सन्तति-प्रमोदमान-मानसे।
कृपा-कटाक्ष-धोरणी-निरुद्ध-दुर्धरापदि
क्वचिद् दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि।।3।।

पर्वतराज हिमालय की पुत्री पार्वती के विलास-काल के सहयोगी आभूषणों से समस्त दिशाओं को प्रकाशित होते देखकर शिव का मन आनन्दित हो जाता है; जिनकी थोड़ी सी भी कृपालु दृष्टि से कठिन विपत्ति दूर हो जाती है, ऐसे दिगम्बर तत्त्व में निमग्न मेरा मन आनन्दित रहे।

जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा 
कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि।।4।। 
पदच्छेद
जटाभुजङ्ग-पिङ्गल-स्फुरत्-फणा-मणिप्रभा
कदम्ब-कुङ्कम-द्रवप्-प्रलिप्त-दिग्वधूमुखे।
मदान्ध-सिन्धुर-स्फुरत्-त्त्वगुत्तरीय-मेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि।।4।।

जिनकी जटा में रहने वाले सर्पो के मणि की पीली आभा का समूह दिग्वधुओं के मुख पर पुता हुआ गुलाल-सा लग रहा है। मतवाले हाथी के हिलते हुए चर्म को चादर के समान ओढ़ने से जिनकी मोटाई बढ़ गयी है, ऐसे भूतनाथ में लगा हुआ मेरा मन आनन्दित हो।

सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर 
प्रसूनधूलिधोरणीविधूसराज्रिपीठभूः।
भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटकः
श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः।।5।। 
महावीर मन्दिर में रुद्राभिषेक का आयोजन।
पदच्छेद
सहस्त्र-लोचनप्-प्रभृत्यशेष-लेख-शेखर
प्रसून-धूलि-धोरणी-विधूसराङ्घि-पीठ-भूः।
भुजङ्ग-राज-मालया निबद्ध-जाट-जूटकः
श्रियै चिराय जायतां चकोर-बन्धु-शेखरः।।5।। 

इन्द्र आदि सभी देवगणों के मस्तक पर स्थित पुष्य के पराग से जिनका पादपीठ धूसरित हो रहा है; सर्पराज की माला से जिनका जटाजूट बँधा हुआ है ऐसे चन्द्रशेखर शिव अनन्त काल तक हमारी श्रीवृद्धि करें।

ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा 
निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम्।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं
महाकपालिसम्पदे शिरोजटालमस्तु नः।।6।। 
पदच्छेद
ललाट-चत्वर-ज्वलद्-धनञ्जय-स्फुलिङ्गभा
निपीत-पञ्चसायकं नमन्-निलिम्प-नायकम्।
सुधा-मयूख-लेखया विराजमान-शेखरं
महाकपालि सम्पदे शिरो जटालमस्तु नः।।6।।

जिन्होंने अपने मस्तकरूपी वेदी पर जलती हुई अग्नि के तेज से कामदेव को नष्ट कर कर डाला था, जिन्हें इन्द्र भी प्रणाम किया करते हैं,चन्द्रमा की कला से सुशोभित मुकुट धारण करने वाले श्रीमहादेव का वह उन्नत विशाल ललाटवाला जटा से युक्त मस्तक हमारी सम्पत्ति की वृद्धिकरे।

करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल 
द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके।
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम।।7।।
पदच्छेद
कराल-भाल-पट्टिका-धगद्-धगद्-धगज्-ज्वल
द्धनञ्जयाहुती-कृत-प्रचण्ड-पञ्चसायके।
धराधरेन्द्रनन्दिनी-कुचाग्र-चित्र-पत्रक
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ।।7।।

अपने भयंकर भालपट्ट पर धक् धक् जलती अग्नि में जिन्होंने प्रचण्ड कामदेव को जला डाला तथा जो पर्वतराज हिमालय की पुत्री के स्तन के अग्र भाग पर विशेषक निर्माण करने में एकमात्र कलाकार हैं ऐसे त्रिनयन शिव में मेरा अनुराग हो।

नवीनमेघमण्डलीनिरुद्धदुर्धरस्फुर-
त्कुहूनिशीथिनीतमःप्रबन्धबद्धकन्धरः।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगधुरन्धरः।।8।। 
पदच्छेद
नवीन-मेघ-मण्डली-निरुद्ध-दुर्धर-स्फुरत्
कुह-निशीथिनी-तमः-प्रबन्ध-बद्ध-कन्धरः।
निलिम्प-निर्झरी-धरस्तनोतु कृत्ति-सिन्धुरः 
कला-निधान-बन्धुरः श्रियं जगद्-धुरन्धरः।।8।।

नये बादल से घिरी हुई अमावस की आधी रात का अँधेरा जिनके गले पर छाया हुआ है; जो हाथी का चर्म लपेटे हुए हैं, वे संसार के भार को धारण करने वाले, गंगा नदी को धारण करने वाले शिव मेरी सम्पत्ति का विस्तार करें। 

प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा-
वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम् ।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे।।9।। 
पदच्छेद
प्रफुल्ल-नील-पङ्कज-प्रपञ्च-कालिम-प्रभा-
वलम्बि-कण्ठ-कन्दली-रुचि-प्रबद्ध-कन्धरम् ।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदान्धक-च्छिदं तमन्तक-च्छिदं भजे ।।9।। 

खिले हुए नीलकमल के समूह के समान श्यामवर्ण की हरिणी की सी छवि वाले चिह्न से जिनकी कण्ठप्रदेश शोभित है ऐसे शिव जो कामदेव, त्रिपुर, संसार, दक्षयज्ञ, हाथी, अन्धकासुर और यमराज का भी संहार करने वाले हैं; मैं उनका नमन करता हूँ।

अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी 
रसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम्। 
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं 
गजान्तकान्धकान्तकंतमन्तकान्तकं भजे।।10।। 
पदच्छेद
अखर्व-सर्वमङ्गला-कला-कदम्ब-मञ्जरी 
रस-प्रवाह-माधुरी-विजृम्भणा-मधुव्रतम्। 
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं 
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे।।10।। 

सबों का मंगल करने वाली पार्वती, जिन्हें अभिमान छू तक नहींगया है उनकी कलारूपी कदम्बमंजरी के रस प्रवाह की माधुरी का पान करने वाले जो भ्रमर हैं; जो कामदेव, त्रिपुर, संसार, दक्षयज्ञ, हाथी, अन्धकासुर और यमराज का भी संहार करने वाले हैं; ऐसे शिव का मैं नमन करता हूँ।

जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस-
द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट। 
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्मङ्गल-
ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः।।11।। 
पदच्छेद
जयत्वदभ्र-विभ्रमब्-भ्रमद्-भुजङ्गमश्वस-
द्विनिर्गमत्-क्रमस्-स्फुरत्-कराल-भाल-हव्यवाट् । 
धिमिद्-धिमिद्-धिमिद-ध्वनन्-मृदङ्ग-तुङ्ग-मङ्गल 
ध्वनि-क्रम-प्रवर्तित-प्रचण्ड-ताण्डवः शिवः।।11। 

जिनके मस्तक पर बड़े वेग के साथ घूमते हुए भुजंग की फुफकार से ललाट की भयंकर अग्नि धधकती हुई क्रमशः फैल रही है तथा जो धम, धम बजते हुए मृदंग की तीव्र किन्तु मंगल ध्वनि के ताल पर भयंकर ताण्डव नृत्य कर रहे हैं, ऐसे भगवान् शंकर की जय हो।।11।।।

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजो-
र्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः। 
तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः 
समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम्।।12।। 
पदच्छेद
दृषद्-विचित्र-तल्पयोर्-भुजङ्ग-मौक्तिक-स्रजोर् 
गरिष्ठ-रत्न-लोष्ठयोः सुहृद्-विपक्ष-पक्षयोः।
तृणारविन्द-चक्षुषोः प्रजा-मही-महेन्द्रयोः 
समप्-प्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम् ।।12।। 

पत्थर और सुन्दर पलंग की सेज में साँप और मोती के हार में, बहुमूल्य रत्न और मिट्टी के ढेले में, मित्र और शत्रु में,  घास का तिनका और कमलनयन में, प्रजा और राजा में, समान भाव रखता हुआ मैं भला कब भगवान् सदाशिव की वन्दना कर सकूँगा।

कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन् 
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन् ।
विलोललोललोचनो ललामभाललग्नकः 
शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम्।।13।। 
पदच्छेद
कदा निलिम्प-निर्झरी-निकुञ्ज-कोटरे वसन् 
विमुक्त-दुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन्। 
विलोल-लोल-लोचनो ललाम-भाल-लग्नकः 
शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम्।।13।। 

अहो! मैं कब भला गंगा के तट पर झुरमुटों में वास करता हुआ अपनी सारी दुर्मति से मुक्त होकर सिर पर हाथ जोड़कर डबडबायी हुई चंचल आँखों से भगवान् शिव के सुन्दर ललाट में दत्तचित्त होकर ‘शिव! शिव!!’ का मन्त्रोच्चार करता हुआ कब सुखी होऊँगा।

निलिम्पनाथनागरी कदम्बमौलिमल्लिका 
निगुम्फनिर्झरक्षरन्' मधुस्मिका' मनोहरः। 
तनोतु मे मनोमुदं विनोदिनीमहर्निशं 
परश्रियः परं पदंतदजत्विषांचयः।।14। 
पदच्छेद
निलिम्प-नाथ-नागरी कदम्ब-मौलि-मल्लिका 
निगुम्फ-निर्झर-क्षरन् मधुस्मिकामनोहरः। 
तनोतु मे मनोमुदं विनोदिनीमहर्निशं 
परश्रियः परं पदं तदङ्गजत्-त्विषांचयः।।14।। 

देवताओं के राजा इन्द्र की नगरी की ललनाओं के सिरों पर गुंथी हुई जूही फूल की माला से अनवरत झरना के समान झरता हुआ तथा उन ललनाओं की मधुर मुस्कान के समान मनोहर शिव के अंग की आभा का समूह हमारे मन में आनन्द फैलाएँ । हमें परम ऐश्वर्य तथा परमपद की प्राप्ति को प्रशस्त करे।

प्रचण्डवाडवानलप्रभाशुभप्रचारिणी 
महाष्टसिद्धिकामिनीजनावहूतजल्पनः। 
विमुक्त वामलोचनाविवाहकालिकध्वनिः' 
शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदासुखी भवाम्यहम्।।15।। 
पदच्छेद
प्रचण्ड-वाडवानलप्-प्रभा-शुभप्-प्रचारिणी 
महाष्टसिद्धि-कामिनी-जनावहूत-जल्पनः। 
विमुक्त वाम-लोचना-विवाह-कालिक-ध्वनिः 
शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदासुखी भवाम्यहम्।।15।। 

समुद्र की भयंकर अग्नि के समान विनाशकारिणी अणिमा आदि अष्ट-सिद्धि-रूपी ललनाओं के विलास के शब्द तथा प्रशस्त सुर-सुन्दरियों के साथ विवाह के समय की मधुर ध्वनि के समान ‘शिव शिव’ यह आनन्ददायक मन्त्र का उच्चारण करता हुआ मैं भला कब सुखी होऊँगा?

इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेति सन्ततम्। 
हरे गुरौ सुभक्तिमाशुयाति नान्यथा गतिं 
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम्।।16।।
पदच्छेद
इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं पठन्-
स्मरन् ब्रुवन्-नरो विशुद्धिमेति सन्ततम्। 
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं 
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम्।।16।। 

इस उत्तमोत्तम स्तुति को पढ़ते हुए, स्मरण करते हुए, बोलते हुए मनुष्य निरन्तर पापरहित हो जाता है। श्रेष्ठ भगवान् शंकर भक्ति शीघ्र ही प्राप्त हो जाती है। दूसरे प्रकार से वे मोक्ष प्राप्त नहींकर सकते हैं, क्योंकि शरीरधारियों के लिए भगवान् शंकर का चिन्तन शोकों का नाश करने वाला है।

पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं 
यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे। 
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां 
लक्ष्मीः सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः।।17।। 
पदच्छेद
पूजावसान-समये दशवक्त्र-गीतं 
यः शम्भु-पूजन-परं पठति प्रदोषे। 
तस्य स्थिरां रथ-गजेन्द्र-तुरङ्ग-युक्तां 
लक्ष्मीः सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः।।17।। 

सायंकाल में पूजा की समाप्ति के समय ‘रावण’ विरचित इस शंकर की पूजा विषयक स्तोत्र का पाठ जो करते हैं उनकी लक्ष्मी सदा हाथी, घोड़ा रथ आदि के साथ स्थिर रहती है तथा भगवान् शंकर उन्हें सुन्दर सम्पत्ति प्रदान करते हैं।

महावीर मन्दिर में स्थापित शिव की भव्य प्रतिमा

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