Dharmayan vol. 89 cover

पत्रिका का यह अंक प्रकाशित प्रति भी मन्दिर में उपलब्ध है, इसे मन्दिर काउण्टर से प्राप्त कर सकते हैं। पाण्डव गीता का प्रामाणिक सम्पादन इस अंक में डा. शशिनाथ झा के द्वारा सम्पादित पाण्डव-गीता का प्रकाशन किया गया है। डा. झा ने मिथिला की प्राचीन पाण्डुलिपि तथा अन्य प्रकाशित प्रतियोंContinue Reading

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इस मास में भी अनेक व्रतों का विधान किया गया है। एकादशी, दशमी, अमावस्या, सप्तमी, अष्टमी आदि तिथियों में व्रतों के विधान किये गये हैं। आज आवश्यकता है कि हम खरमास नाम के कारण उन भ्रान्तियों को दूर करें तथा कुछ अज्ञानी ज्योतिषियों के द्वारा फैलायी गयी कहानियों पर ध्यान न दें।Continue Reading

खरमास को लेकर भ्रान्ति दूर करने का प्रयास महावीर मन्दिर की पत्रिका “धर्मायण” का पौष मास के अंक का विमोचन अग्रहायण की पूर्णिमा दिनांक 30 दिसम्बर को सन्ध्या में किया जायेगा। यह अंक खरमास विशेषांक के रूप में तैयार किया गया है जो वर्तमान में कोविड-19 के कारण केवल इ-पत्रिकाContinue Reading

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Dharmayan vol. 101

महावीर मंदिर की ओर से प्रकाशित धर्मायण पत्रिका का 101वाँ अंक वैष्णव-उपासना विशेषांक कई अर्थों में विशेष है। इस अंक में भगवान् विष्णु एवं उनसे सम्बद्ध देवों की उपासना एवं इसकी महत्ता पर विशेष सामग्री प्रकाशित है। Continue Reading

मगध की सूर्यपूजा की कथा द्वापर युग के अंत समय से जुड़ी हुई है। भगवान् कृष्ण के पुत्र साम्ब को कुष्ठ रोग हो गया था, जिसे ठीक करने के लिए वसिष्ठ की आज्ञा से शाकद्वीप से सूर्योपासक मग ब्राह्मण लाये गये। घटना का क्रम ऐसा हुआ कि वे लोग मगधContinue Reading

(Title Code- BIHHIN00719), धार्मिक, सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय चेतना की पत्रिका, मूल्य : पन्द्रह रुपये प्रधान सम्पादक  भवनाथ झा सहायक सम्पादक- श्री सुरेशचन्द्र मिश्र पत्राचार : महावीर मन्दिर, पटना रेलवे जंक्शन के सामने पटना- 800001, बिहार फोन: 0612-2223798 मोबाइल: 9334468400 E-mail: dharmayanhindi@gmail.com Web: www.mahavirmandirpatna.org/dharmayan/ पत्रिका में प्रकाशित विचार लेखक के हैं। इनसेContinue Reading

धर्मायण अंक संख्या 100 का मुखपृष्ठ

“धर्मायण” के 100वें अंक का सम्पादकीय महावीर मन्दिर की धार्मिक, सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय चेतना की मासिक पत्रिका “धर्मायण” का 100वाँ अंक सुधी पाठकों के कर-कमलों में समर्पित करते हुए अपार हर्ष की अनुभूति हो रही है। अभी तक सुधी पाठक इस पत्रिका में निहित विचारों से लाभान्वित होते रहे हैं।Continue Reading