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धर्मायण, अंक संख्या 88, कार्तिक-पौष 2072 वि.सं., अक्टूबर-मार्च, 2015-16ई.

Dharmayan-vol.-88-कार्तिक-पौष-2072

इस अंक के प्रमुख आकर्षण

रामचरितमानस के प्रथम सम्पादन की विशेषता (सुन्दरकाण्ड के सन्दर्भ में)

बहुत कम पाठकों को यह विदित है कि गोस्वामी तुलसीदास रचित रामचरित मानस के प्रथम सम्पादक, हिन्दी के आदि गद्यकार, पं- सदल मिश्र थे। उनके द्वारा सम्पादित यह ग्रन्थ कलकत्ता से 1810 ई- में प्रकाशित हुआ था। यह एक हस्तलिखित प्रकाशन था, जिसमें लीथो प्रिंटिंग की तकनीक अपनायी गयी थी। बहुत कम संख्या में छपाई के कारण कम समय में ही यह अनुपलब्धा हो गया। पं- श्यामसुन्दर दास ने नागरी प्रचारणी सभा, बनारस से रामचरितमानस का सम्पादन करते समय भूमिका में इस संस्करण का उल्लेख किया है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने भी हिन्दी साहित्य के इतिहास में इसका उल्लेख मात्र किया है।

पं. रामावतार शर्मा संस्कृत वाङ्मय के क्षेत्र में बिहार के गौरव रहे हैं। वे परम्परा के दुर्धर्ष विद्वान् होने के साथ साथ मौलिक चिन्तक थे। प्रसिद्ध ग्रन्थ परमार्थदर्शनम् में उन्होंने आधाुनिक विज्ञान के आलोक में वैशेषिक दर्शन की प्राचीन मान्यताओं को भी परिमार्जित किया है।

उन्होंने केवल गंगाजल पीकर हनुमानजी की स्तुति में एक सौ पद्यों का काव्य मारुतिशतकम् की रचना की थी। इस ग्रन्थ का प्रकाशन महावीर मन्दिर से 1999 ईं में हुआ है। इसी मारुतिशतकम् के वैशिष्ट्य पर प्रकाश डाल रहे हैं प्रो- चन्द्रशेखर भारद्वाज।

आलेख-सूची

  1. सरस्वती वंदना— डा. अशोक मिश्र
  2. (सम्पादकीय आलेख) रामचरितमानस के प्रथम सम्पादन की विशेषता  — पं. भवनाथ झा
  3. भारतीय दर्शन में मुक्ति की अवधारणा— साहित्यवाचस्पति डा. श्रीरंजन सूरिदेव
  4. अब लौं नसानीं, अब ना नसैहौं — श्री सुरेश चन्द्र मिश्र
  5. भगवानगंज (मसौढ़ी) का द्रोण स्तूप— श्री मगन देव नारायण सिंह
  6. साहेब रामदास के रामभक्ति-विषयक पाँच पद— पं. भवनाथ झा
  7. पं. रामावतार शर्मा के मारुतिशतकम् के हनुमान् — प्रो. चन्द्रशेखर द्विवेदी भारद्वाज
  8. पटना में छठ-पर्व का एक वृत्तान्त  फेनी पार्क्स— अनु. डॉ. छाया कुमारी
  9. पाटलिपुत्र की ऐतिहासिक विरासत— श्री ओम प्रकाश सिन्हा
  10. रामानुजाचार्य का भक्ति के विकास में योगदान — श्री युगल किशोर प्रसाद
  11. राष्ट्रीय अस्मिता और हिन्दी  — श्री आलोक कुमार
  12. ‘पूषा’ रूप में सूर्य— डा. किरण कुमारी शर्मा
  13. प्राचीन काल में यज्ञ का महत्त्व— डा. मोना बाला
  14. भारतीय ज्योतिष की दृष्टि से नेत्ररोग-विमर्श— आचार्य राजनाथ झा
  15. मन्दिर समाचार परिक्रमा
  16. अन्य स्थायी स्तम्भ

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