ईश्वर की शरणागति

ईश्वर की शरण में पहुँचकर उनमें विलीन हो जाना भक्ति का लक्ष्य है। इसे शरणागति कहा गया है।

शरणागति किसे कहते है?

भगवान् की शरण में जाना शरणागति है। यह शरणागति छह प्रकार की होती है-

Dharmayan vol. 101

अहिर्बुध्न्य संहिता का प्रमाण

अनुकूलस्य संकल्पः प्रतिकूलस्य वर्जनम्।
रक्षिष्यतीति विश्वासः गोप्तृत्वे वरणं तथा ।।
आत्मनिक्षेपकार्पण्ये षड्विधा शरणागतिः ।। (अहिर्बुध्न्य संहिता-37/28-29)।

(1) अनुकूलस्य संकल्पः – इसमें भक्त सदैव भगवान् के अनुकूल रहने का संकल्प लेता है ।

(2) प्रतिकूलस्य वर्जनम् – भगवान् के लिये प्रतिकूल भावना का त्याग ।

(3) रक्षिष्यतीति विश्वासः – भगवान् सदैव मेरी रक्षा करेंगे, ऐसा दृढ़ विश्वास रखना।

(4) गोप्तृत्वे वरणं – भगवान् को अपना रक्षक के रूप में देखना अथवा स्वीकार करना।

(5) आत्मनिक्षेप – भगवान् के श्रीचरणों में स्वयं को समर्पित कर देना एवं

(6) कार्पण्य – अत्यन्त दीन होना।

शरणागति के इन सिद्धान्तों को भक्तिकाल के लगभग सभी कवियों ने स्वीकार किया है तथा अपने साहित्यों में स्थान देकर विस्तृत विवेचना भी की है । अतः शरणागति के प्रत्येक अंगों पर इनकी रचनाएँ, दोहे आदि देखे जा सकते हैं।

विशेष पढने के लिए पढें

आलेख- पाञ्चरात्र-साहित्य में वैष्णव-भक्ति—श्री महेश प्रसाद पाठक, धर्मायण, अंक संख्या- 101, वैष्णव उपासना विशेषांक

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