धर्मायण

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      Dharmayan vol. 88

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    • Dharmayan vol. 89 cover

      Dharmayan vol. 89

      January 2, 2021
      1
    • धर्मायण अंक संख्या 85, माघ-चैत्र 2071 वि.सं., जनवरी-मार्च 2015 ई.

      Dharmayan vol. 85

      May 10, 2020
      1
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      May 10, 2020
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      Dharmayan vol. 83

      May 10, 2020
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    • “धर्मायण” की अंक संख्या 82

      Dharmayan vol. 82

      May 10, 2020
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      May 9, 2020
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  • अंक 91-100
    • धर्मायण अंक संख्या 100 का मुखपृष्ठ

      dharmayan vol.100 Surya-Upasana Ank

      October 30, 2020
      4
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      Dharmayan vol. 97 Nag-puja Ank

      July 5, 2020
      6
    • Dharmayan vol. 96

      June 12, 2020
      0
    • आवरण धर्मायण, अंक 95

      Dharmayan vol. 95 Ganga Ank

      May 7, 2020
      2
    • धर्मायण अंक संख्या 94, वैशाख 2077 वि.सं.

      Dharmayan, vol. 94

      April 20, 2020
      2
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    • Dharmayan vol. 91
  • अंक 101-110
    • Dharmayan, vol. 110 Saptarshi Ank

      धर्मायण अंक संख्या 110, सप्तर्षि अंक

      August 22, 2021
      1
    • Dharmayan, vol. 110 Saptarshi Ank

      धर्मायण अंक संख्या 110, सप्तर्षि विशेषांक

      August 22, 2021
      1
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      Dharmayan vol. 110 Saptarshi Ank

      August 16, 2021
      1
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      धर्मायण अंक संख्या 109 पी.डी.एफ

      July 24, 2021
      1
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      July 24, 2021
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      July 5, 2021
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वाल्मीकि-रामायण में श्रीराम के गुणों का वर्णन

By सम्पादक-धर्मायण पत्रिका-महावीर मन्दिर, पटना
December 5, 2019
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मर्यादा-पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम का वर्णन आदिकवि वाल्मीकि के शब्दों में यहाँ प्रस्तुत है। वाल्मीकि रामायण के आरम्भ में ही महर्षि वाल्मीकि के प्रश्नों के उत्तर देते हुए नारद भगवान् श्रीराम के गुणों का विस्तृत वर्णन करते है। इन विशेषणों की व्याख्या यहाँ की जा रही है।

इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न श्रीराम लोक में प्रसिद्ध हुए। उनके गुण इस प्रकार हैः

  1. नियतात्मा- दृढ चित्तवाले- भगवान् श्रीराम का चित्त यानी मन दृढ है। वे कभी विचलित नहीं होते हैं। वे जो सोचते हैं वही करते हैं।
  2. महावीर्यः- महान् शक्तिशाली। अपनी महान् शक्ति से उन्होंने दुष्ट राक्षसों का वध किया था। उनकी शक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती। उनके धनुष से छोड़ा गया बाण अपना लक्ष्य वेध कर ही वापस आता है।
  3. द्युतिमान्- तेजस्वी। द्युति का अर्थ होता है- तेज, कान्ति, दीप्ति। भगवान् श्रीराम कान्ति धारण करते हैं। इनकी शोभा निराली है। इनका सौन्दर्य कामदेव को भी लज्जित करनेवाला है।
  4. धृतिमान्- धैर्य रखनेवाले। भगवान् श्रीराम का धैर्य जगत् में विख्यात है। वे शोक एवं हर्ष, दोनों क्षणों में समान रूप से गम्भीर रहते हैं। वाल्मीकि ने आगे कहा है कि भगवान् श्रीराम का धैर्य हिमालय के समान है। जिस प्रकार हिमालय कभी अपने स्थान से हिलता-डुलता नहीं है उसी प्रकार भगवान् श्रीराम कभी विचलित नहीं होते हैं।
  5. वशी- सबको वश में करनेवाले। भगवान् श्रीराम सम्पूर्ण संसार को अपने वश में करनेवाले हैं। कोई उनके लिए अवश नहीं है। चाहे कोई कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, श्रीराम से आगे नहीं है।
  6. बुद्धिमान्- भगवान्‌ श्रीराम तीक्ष्ण एवं परमबुद्धि से सम्पन्न महान मेधावान एवं परम ज्ञानी हैं। संसार में इनसे बढ़कर और कोई दूसरा ज्ञानी हो ही नहीं सकता।
  7. नीतिमान्- नीति के मार्ग पर चलनेवाले श्रीराम के समान सुनीति मार्ग पर चलनेवाले संसार में शायद ही हुआ करते हैं।
  8. वाग्मी- सुन्दर वाणी बोलनेवाले भगवान्‌ श्रीमान की वणी की मधुरता इतनी अच्छी है कि जिसे श्रवण करते हुए भी कभी मन नहीं भरता।
  9. श्रीमान्- शोभा, कान्ति, लक्ष्मी आदि श्रियों से सम्पन्न भगवान्‌ श्रीराम अलौकिक प्रतिभावान भी हैं।
  10. शत्रुनिबर्हणः- शत्रुओं का नाश करनेवाले अन्यायियों के लिए भगवान्‌ श्रीराम परम शत्रु के समान हैं। शत्रुओं का नाश करनेवाले महान धर्मनिष्ठ तथा परम वीर एवं अति तेजस्वी हैं। समस्त संसार में इनसे बढ़कर कोई दूसरा वीर है ही नहीं।
  11. विपुलांसः- विशाल एवं चौड़ी कन्धावाले – भगवान् श्रीराम की कन्धा चौड़ी होने का अभिप्राय यह है कि प्रायः वीर पुरुषों की कन्धा चौड़ी ही हुआ करती है।
  12. महाबाहुः- विशाल बाहुवाले – भगवान् श्रीराम की भुजाएँ भी विशाल थीं जो वीरता का भी परिचायक है। उन्हें आजानुबाहु भी कहा गया है, जो सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार दिव्य प्रतिभावान पुरुषों के ही लक्षण हैं।
  13. कम्बुग्रीवः- शंख के समान गरदन वाले। सौन्दर्य शास्त्र में महान् व्यक्तियों की गरदन की शोभा शंख के समान् बतलायी गयी है अर्थात जिनकी गरदन शंख के समान होता है वे अवश्य ही महान पुरुष होते हैं।
  14. महाहनुः- विशाल टुड्ढी वाले महापुरुष भगवान् श्रीराम की टुड्ढी भी विशाल थी, जो गौरव का प्रतीक है। इसी प्रकार विशाल टुड्ढी वाले हनुमानजी भी हैं, इसलिए उन्हें भी हनुमान् कहा गया है। यद्यपि हनु तो भी मनुष्यों को रहती है, किन्तु हनुमान् शब्द का प्रयोग विशालता को प्रदर्शित करने के लिए किया गया है। श्रीराम भी विशाल हनु वाले हैं। सामुद्रिक शास्त्र में इसे भी दिव्य पुरुष का लक्षण कहा गया है।
  15. महोरस्कः- चौड़ी छाती वाले। जिनकी छाती चौड़ी हो अवश्य ही वीर पुरुष होते हैं, भगवान् श्रीराम की भी छाती बहुत चौड़़ी थी।
  16. महेष्वासः- धनुष का संधान करनेवालों में महान्। यह नाम विष्णु सहस्रनाम में भी आया है। भगवान् विष्णु के सहस्रनामों में 183वाँ नाम महेष्वासः है। इसके व्याख्याकारों ने लिखा है कि भगवान् विष्णु का यह रूप रामावतार में प्रकट हुआ है। वाल्मीकि रामायण में श्रीराम के महान् धनुर्धर होने का वर्णन अनेक स्थानों पर आया है।
  17. गूढजत्रुः- कंधा और बाँह के जोड़ को जत्रु कहते हैं। वीर पुरुष के लक्षण में यह कहा गया है कि कंधा और बाँह की संधि कसी हुई हो, वह ढीला-ढाला न हो। श्रीराम के वर्णन में गूढजत्रुः से इसी बात की पुष्टि की गयी है।
  18. अरिन्दमः- शत्रुओं का दमन करनेवाले। अरि अर्थात् शत्रु और दमः यानी दमन करनेवाले। भगवान् श्रीराम शत्रुओं का दमन करनेवाले हैं।
  19. आजानुबाहुः- जानु अर्थात् घुटना, बाहु अर्थात् भुजा। इसप्रकार जानुबाहु का अर्थ हुआ जिनकी भुजा घुटनों तक लम्बी हो। सामान्य व्यक्ति की भुजा घुटना से ऊपर तक ही रह जाती है, किन्तु महापुरुषों की भुजाएँ लम्बी होती है और घुटनों तक पहुँच जाती है। यह दिव्य पुरुष का लक्षण है।
  20. सुशिराः- सुन्दर शिराओं वाले। शिरा अर्थात् Muscle होता है। सुन्दर शिराएँ होना वीरता का लक्षण है।
  21. सुललाटः- ललाट का अर्थ होता है- कपार का आगेवाला भाग। इसे अंग्रेजीमे forehead कहते हैं। श्रीराम के 22. शरीर में यह कपाल सुन्दर है। सामुद्रिक शास्त्र में उन्नत ललाट, तीन रेखा वाला ललाट जिस व्यक्ति का होता है, वह महापुरुष की स्रेणी में गिना जाता है। सौन्दर्य शास्त्र में भी सुन्दर ललाट का होना श्रेष्ठ पुरुष का लक्षण है।
  22. सुविक्रमः- विक्रम अर्थात् पराक्रम एवं शक्ति जिनका सुन्दर हो। यहाँ पराक्रम की उचित दिशा भी अभिप्रेत है। यदि किसी व्यक्ति में बल तो हो लेकिन उसका प्रयोग वह यदि गलत दिशा में करता है तो उसे सुविक्रम नहीं कहेंगे। भगवान् श्रीराम का पराक्रम दुष्टों के विनाश तथा शरणागतों, भक्तों की रक्षा करने की दिशा में है।
  23. समः- समः शब्द से दो अर्थ अभिप्रेत है। समः शब्द का अर्थ है- समान। श्राराम सुख-दुख दोनों में समान रहनेवाले भी इसका अर्थ होता है। वे न तो सुख के क्षणों में उद्धत होते हैं, न ही दुःख में अपना धैर्य खोते हैं। श्रीराम के सन्दर्भ में इसका दूसरा अर्थ भी है- श्रीराम के शरीर के सभी अवयव अपने अपने मान के साथ संतुलित हैं। अधिकांग और हीनांग दोष से रहित है।
  24. समविभक्ताङ्गः- समान रुप से विभाजित अंगों वाले। श्रीराम के सभी अंग समान रुप से विभक्त हैं, न तो कोई अंग छोटा है न बड़ा।
  25. स्निग्धवर्णः- स्निग्ध का अर्थ कोमल होता है। लेकिन वर्ण अर्थात् रंग के सन्दर्भ में भी स्निग्ध शब्द का व्यवहार होता है। रंग के साथ स्निग्ध का व्यवहार होने पर उसका अर्थ होता है- ऐसा रंग जो देखने में सुन्दर लगे, लोगों की आँखों में खटके नहीं। श्रीराम का वर्ण नीलकमल एवं नीलम मणि के समान है, जो देखने में लुभावना है।
  26. प्रतापवान्- भगवान् श्रीराम प्रतापी हैं। प्रतापी को ही प्रतापवान् भी कहा जाता है। दोनों का अर्थ एक ही है। प्रखर ताप जिससे उत्पन्न हो उसे प्रताप कहते हैं। दुष्टों के नाश के सन्दर्भ में श्रीराम प्रतापी हैं।
  27. पीनवक्षा- पीन का अर्थ मोटा होता है। और वक्षस् का अर्थ छाती होता है। जिनकी छाती मोटी हो अर्थात् हृष्ट-पुष्ट हो उसे पून वक्षा कहते हैं। श्रीराम की छाती बड- है, इससे उनकी वीरता का बोध होता है।
  28. विशालाक्षो- अक्षिः का अर्थ है आँख। विशाले अक्षिणी यस्य स विशालाक्षः। बहुब्रीहौ सक्थ्यक्ष्णोः स्वाङ्गात् सूत्र से षच् प्रत्यय होकर विशालाक्षः शब्द बना। अर्थात् जिनकी आखें बड़ी-बड़ी हों। भगवान् श्रीराम की आँखों की उपमा कमल के दल से दी गयी है। यह भी शुभलक्षण माना गया है।
  29. लक्ष्मीवान्- लक्ष्मी शब्द का एक अर्थ शोभा भी है। इस अर्थ में श्रीराम के सभी अंग शोभा से सम्पन्न हैं, यह भाव है। लक्ष्मी भगवान् विष्णु की पत्नी मानी गयी हैं। भगवान् श्रीराम विष्णु के अवतार हैं। अतः जगज्जननी जानकी लक्ष्मी हैं। इस अर्थ में भी लक्ष्मीवान् हैं।
  30. शुभलक्षणः- शरीर के चिह्न को लक्षण कहते हैं। जिससे हम किसी वस्तु की पहचान करते हैं वह लक्षण कहलाता है। भगवान् श्रीराम के सभी लक्षण शुभ हैं।
  31. धर्मज्ञः- धर्म को जानने वाले। धर्म का व्यावहारिक अर्थ होता है- कर्तव्य- हम जो करते हैं, हमें जो करना चाहिए, वह धर्म कहलाता है। भगवान् श्रीराम अपने धर्म पालन हेतु ही पिता की इच्छा को स्वीकार कर चौदह वर्षों का वनवास स्वीकार किया।
  32. सत्यसन्धश्च- भगवान् श्रीराम की प्रतिज्ञा सत्य होती है। उनकी प्रतिज्ञा है कि- सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते। अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम। अर्थात् जो कोई एक बार भी मेरी शरण में आ जाता है और याचना करता है कि मैं आपका हूँ तो उसे मैं सभी प्राणियों के भय से मुक्ति दिलाता हूँ। भगवान् की यह प्रतिज्ञा सत्य है, अतः उन्हें सत्यसन्धः कहा गया है।
  33. प्रजानां च हिते रतः- भगवान् श्रीराम अपनी प्रजा की भलाई के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। आवश्यकता है कि हम स्वयं को उनकी प्रजा के रूप में मानें और श्रीराम को अपना राजा मान लें।
  34. यशस्वी- रावण आदि के वध का जो दिव्य यश है, उससे सम्पन्न भगवान् श्रीराम हैं।
  35. ज्ञानसम्पन्नः- इस शब्द की व्याख्या करते हुए वाल्मीकीय रामायण के तिलक भाष्यकार ने कहा है कि श्रीराम ब्रह्मज्ञान से सम्पन्न हैं। इसलिए उन्होंने जटायु से कहा कि मया त्वं समनुज्ञातो गच्छ लोकाननुत्तमान् अर्थात् हे जटायु तुम मेरे देश से सबसे उत्तम लोक में जाओ। इस प्रकार का ब्रह्मोपदेश कोई ब्रह्मज्ञानी ही कर सकते हैं और विना ब्रह्मोपदेश का सबसे उत्तम लोक में वास सम्भव नहीं है। अतः भगवान् श्रीराम ब्रह्मज्ञानी भी हैं
  36. शुचिः- शुचिः शब्द का अर्थ पवित्र होता है। प्रातःस्नान आदि से, प्राणायाम के अभ्यास से, प्रत्याहार आदि से राग एवं द्वेष का परित्याग करनेवाले भगवान् श्रीराम सभी परिस्थितियों में बाह्य एवं आन्तरिक शुद्धिवाले हैं। 
  37. वश्यः- पिता, आचार्य एवं देवता के वशमें रहनेवाले। मर्यादापुरुषोत्तम की दृष्टि से वश्य शब्द की यह व्याख्या होगी। किन्तु भक्तों के वश में रहनेवाले भगवान् श्रीराम हैं, यह भक्ति की परम्परा की दृष्टि से व्याख्या होती है। जब कोई भक्त आर्त भाव से भगवान् को पुकारता है तो भगवान् वश में होकर भक्त के पास दौड़े चले आते हैं। भक्ति-परम्परा के इस तथ्य को भागवत-पुराण में स्पष्ट किया गया है-  अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज । साधुभिर्ग्रस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजनप्रियः ॥ (श्रीमद्भा॰ ९ । ४ । ६३) भगवान् दुर्वासा से कहते हैं कि मैं स्वतन्त्र नहीं हूँ, मैं भक्तों के अधीन रहता हूँ। अतः वाल्मीकि रामायण में भी भगवान् श्रीराम को वश्यः कहा गया है।
  38. समाधिमान्- यद्यपि समाधि को योगशास्त्र का अन्तिम अंग माना गया है, किन्तु वाल्मीकि रामायण के व्याख्याकारों नें इस माधिमान् शब्द की व्याख्या दूसरे ढंग से की है। तिलक टीकाकार लिखते हैं कि श्रीराम अपने तत्त्व में लीन रहते हैं। उनका अपना तत्त्व ही ब्रह्मतत्त्व है, जिसमें वे हमेशा लीन रहते हैं। रामायणशिरोमणि टीकाकार गोविन्दराज ने लिखा है कि अपने आश्रितों के पालन के विषय में चिन्तन करनेवाले। भक्तों का परिपालन करने की चिन्ता करना ही भगवान् की समाधि की अवस्था होती है।
  39. प्रजापतिसमः- प्रजाओं के स्वामी ब्रह्मा आदि के समान। प्रजा की उत्पत्ति, पालन एवं संहार करने में ब्रह्मा, विष्णु महेश के गुणों से परिपूर्ण। तिलक टीकाकार ने यहाँ एक प्रश्न उठाया है कि जब राम स्वयं ब्रह्म हैं तब समः शब्द का व्यवहार क्यों किया गया है? समः अर्थात् समान शब्द का व्यवहार वहाँ होता है, जहाँ तुलना तो की जाती है पर कुछ न कुछ भिन्नता अवश्य रहती है। इसका समाधान करते हुए वे कहते हैं कि यद्यपि श्रीराम ब्रह्म ही है, तथापि शोक मोह आदि जो मनुष्य के धर्म हैं वे भी श्रीराम के व्यक्तित्व में हम देखते हैं, वे सगुण हैं अतः ब्रह्म के साथ भिन्नता है। किन्तु वे भी परशुराम को भार्गव लोक प्रदान करते हैं, जटायु को मोक्ष प्रदान करते हैं तथा सभी अयोध्यावासियों को एक साथ मोक्ष प्रदान करने में समर्थ हैं अतः उन्हें ब्रह्म के समान कहा गया है।
  40. श्रीमान्- सभी प्रकार के ऐश्वर्य सम्पन्न श्रीराम। नित्य विभूतियों को धारण करनेवाले श्रीराम।
  41. धाता- पिता के समान सभी प्रजाओं के पालन-पोषण करने में समर्थ।
  42. रिपुनिषूदनः- शत्रुओं का संहार करनेवाले। जो स्वयं संसार के स्वामी हों उनका शत्रु कैसा? इसलिए इस शब्द का अर्थ कहा गया है कि भक्तों और आश्रित लोगों के शत्रुओं का विनाश करनेवाले तथा काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद एवं मात्सर्य इन छह शत्रुओं का नाश करनेवाले।
  43. रक्षिता जीवलोकस्य- भगवान् श्रीराम जीवलोक की रक्षा करनेवाले हैं। रक्षिता शब्द का अर्थ रक्षक होता है। भगवान् श्रीराम सभी लोगों के लोक-व्यवहार के प्रवर्तक हैं अर्थात् संसार के जीव जो कुछ भी करते हैं उन कार्यों को करानेवाले श्री राम ही हैं। उन्हीं की कृपा से जीव प्राण धारण करते हैं।
  44. धर्मस्य परिरक्षिता- धर्म की रक्षा करनेवाले। भगवान् श्रीराम धर्म के रक्षक हैं। जहाँ कहीं भी धर्म की रक्षा में बाधा उत्पन्न होती है तो वे स्वयं इस कार्य को करते हैं।
  45. वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञः- चारों वेद- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद तथा छह वेदाङ्ग- शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द एवं ज्यौतिष् इनके तत्त्वों को जानने वाले अर्थात् सभी विद्याओं के ज्ञाता। यहाँ पर वेद शब्द के ग्रहण से चारों उपवेदों का भी ग्रहण होता है- चार उपवेद हैं- आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद तथा अर्थशास्त्र।
  46. धनुर्वेदे च निष्ठितः- इसके द्वारा भगवान् श्रीराम को धनुष चलाने की विद्या में निष्णात बताया गया है। यह सर्वविदित है कि उन्होंने विश्वामित्र से सभी प्रकार के अस्त्रों एवं शस्त्रों को चलाने की शिक्षा ली थी।
  47. सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञः- सभी शास्त्रों के तत्त्व को जानने वाले।
  48. स्मृतिमान्- यहाँ स्मृति शब्द का प्रयोग दो अर्थों में आया है। एक अर्थ है कि भगवान् श्रीराम सभी स्मृति-ग्रन्थों के जानकार हैं। स्मृति-ग्रन्थ आचार, धर्म एवं न्याय तीनों को परिभाषित करता है, अतः स्मृतिमान् शब्द से श्रीराम की दक्षता इन तीनों शास्त्रों में भी दिखायी गयी है। स्मृति का दूसरा अर्थ है- स्मरण रखना। अध्ययन किये गये विषयों को तथा भक्तों की पुकार को वे स्मरण रखते हैं।
  49. प्रतिभानवान्- सुनी-अनसुनी बातों पर विचार करते समय अचानक स्फूर्ति को प्रतिभा कहते हैं। इस प्रकार की स्फूर्ति रखनेवाले।
  50. सर्वलोकप्रियः- सभी लोगों के प्रिय। अथवा स्वर्ग आदि सभी लोकों में प्रिय।
  51. साधुः- साधु शब्द की व्याख्या करते हुए वाल्मीकि रामायण के टीकाकारों ने मृदु एवं मधुर स्वभाव का उल्लेख किया है- साधुर्मृदुमधुरस्वभावः। यह साधु शब्द का व्यापक अर्थ है। जिनका स्वभाव कोमल एवं मधुर हो, उसे साधु कहते हैं।
  52. अदीनात्मा- जिनका मन कभी कृपणता से भरा हुआ न हो, जो स्वयं को छोटा न समझें तथा किसी भी परिस्थिति में दबकर न रहें। भगवान् श्रीराम की यह विशेषता है कि वे घोर संकट में भी थोड़ा भी दबकर नहीं रहते है, परिस्थितयों से समझौता नहीं करते हैं।
  53. विचक्षणः- लौकिक एवं अलौकिक कार्य करने में कुशल व्यक्ति को विचक्षण कहते हैं। इस शब्द का सामान्य अर्थ है- विद्वान्। श्रीराम इन दोनों प्रकार से विचक्षण कहे गये हैं।
  54. सर्वदाभिगतः सद्भिः समुद्र इव सिन्धुभिः- जिस प्रकार सभी नदियाँ समुद्र तक पहुँचने के लिए प्रयत्न करती है अर्थात् जिस प्रकार समुद्र सभी नदियों के द्वारा सेवित होता है, उसी प्रकार श्रीराम सभी अच्छे लोगों के द्वारा सेवित हैं तथा सभी अच्छे लोग उन्हीं तक पहुंचना चाहते हैं।
  55. आर्यः- आर्य शब्द का सामान्य अर्थ है- हमेशा चलनेवाला। गति के अर्थ में ऋ धातु से यह शब्द बना है। तिलक टीकाकार के अनुसार भगवान् श्रीराम सभी लोगों के द्वारा पूज्य हैं अतः उन्हें आर्य कहा गया है- आर्यः सर्वपूज्यः।
  56. सर्वसमः च एव- सब के लिए समान। वाल्मीकि रामायण के टीकाकार गोविन्दराज ने इस स्थल पर व्य़ायाख्या की है कि श्रीराम जाति, गुण, वृत्ति अर्थात् आचरण आदि के भेद-भाव के विना सभी लोगों के लिए समान रूप से पूज्य हैं। सभी लोगों को श्रीराम की शरण में जाने का अधिकार है।
  57. सदा एकप्रियदर्शनः- हमेशा निश्चित रूप प्रिय दीखनेवाले श्रीराम। मनुष्य सभी काल और परिस्थित में प्रिय नहीं दीखता है। वह कभी न कभी ऐसी स्थित में अवश्य आ जाता है, जहाँ सामनेवाले व्यक्ति के लिए वह अप्रिय बन जाता है। लेकिन भगवान् श्रीराम की विशेषता है कि वे कभी भी किसी परिस्थिति में भी अप्रिय नहीं लगते।
  58. स च सर्वगुणोपेतः- वे श्रीराम सभी उत्कृष्ट गुणों से सम्पन्न हैं। वैशेषिक दर्शन में 24 गुण माने गये हैं-  रूप, रस, गंध, स्पर्श, संख्या, परिणाम, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्त्व, अपरत्त्व, द्रवत्त्व, गुरुत्व, स्नेह, शब्द, बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म और संस्कार। इन 24 गुणों में जो जो उत्तम गुण हैं, उनसे परिपूर्ण श्रीराम हैं।
  59. कौसल्यानन्दवर्धनः- माता कौशल्या का आनन्द बढानेवाले। यद्यपि श्रीराम ब्रह्म के समान हैं, उन्हे प्रजापतिसमः कहा गया है
  60. समुद्र इव गाम्भीर्ये- गम्भीरता का सामान्य अर्थ है- गहराई। गहराई में समुद्र सबसे आदर्श माना गया है। समुद्र अथाह है। इस गम्भीरता के सन्दर्भ में भगवान् श्रीराम की तुलना समुद्र के साथ की गयी है। इस गहराई के कारण वे विपरीत परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होते हैं।
  61. धैर्येण हिमवान् इव- धीरता के भाव को धैर्य कहते हैं। स्थिर रहना विचलित नहीं होना धीरता है। इस विशेषता के लिए हिमालय संस्कृत काव्य जगत में सबसे प्रसिद्ध उपमान रहा है। किनती भी आँधी क्यों न आवे, हिमालय कभी डिगता नहीं, वह धीरतापूर्वक अविचल खड़ा रहता है। श्रीराम में भी यह विसेषता है कि किसी भी परिस्थिति में वे अपना आपा नहीं खोते रहे हैं।
  62. विष्णुना सदृशो वीर्ये- विष्णु के समान वीरता वाले। भगवान् श्रीराम विष्णु ही हैं, तब सदृशः का प्रयोग क्यों का गया? इसका उत्तर देते हुए तिलक टीकाकार कहते हैं कि मनुष्य के रूप में जन्म लेने के कारण उपाधि भेद से सभी स्थानों पर उन्हें प्रजापति अथवा विष्णु के समान कहा गया है।
  63. सोमवत्प्रियदर्शनः- चन्द्रमा के समान सौम्य दर्शन वाले। जिस प्रकार चन्द्रमा सभी व्यक्तियों को सुन्दर ही दीखता है, उसी प्रकार भगवान् श्रीराम की प्रजा एव उनके भक्त उन्हें प्रिय रूप में सुन्दर रूप में ही देखते हैं।
  64. कालाग्निसदृशः क्रोधे- प्रलय काल की अग्नि के समान क्रोधवाले। जब श्रीराम अपने स्त्रुओं पर कुपित होते हैं तो उनका क्रोध काल की अग्नि अर्थात् सभी का अन्त करनेवाले अग्नि के समान हो जाता है। देवतागण भी युद्ध में उनके क्रोध से काँप जाते हैं। श्रीराम की इस विशेषता का उल्लेख आदिकवि वाल्मीकि ने इन शब्दों में किया है- कस्य विभ्यति देवाश्च जातरोषस्य संयुगे।
  65. क्षमया पृथिवीसमः- पृथ्वी का नाम ही क्षमा एवं क्ष्मा है। अपने प्रति की गयी बुराई को भी पृथ्वी से अधिक कोई नहीं भूलती है। धरती को हल के फाल से चीरते हैं फिर भी अपना घाव भूलकर हमारे लिए अन्न ही देती है। क्षमा करने में, किये गये अपराध को भूल जाने में माता पृथ्वी सर्वोपरि हैं। भगवान् श्रीराम भी क्षमावान् हैं। वे भी पृथ्वी की तरह क्षमा कर देते हैं।
  66. धनदेन समस्त्यागे- दूसरे को कुछ देने में धनद अर्थात् कुबेर प्रसिद्ध हैं। भगवान् श्रीराम भी उसी प्रकार सबकुछ अपने भक्तों को देते रहते हैं।
  67. सत्ये धर्म इवापरः – सत्य में धर्म की मूर्ति के समान। भगवान् श्रीराम को वाल्मीकि ने धर्म का मूर्त रूप कहा है- रामो विग्रहवान् धर्मः। धर्म तो निराकार है, किन्तु यदि उसकी मूर्ति की कल्पना की जाये तो श्रीराम के समान वह मूर्ति होगी। इसी बात को यह कहा गया है।
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